भोपाल का ऐशबाग आरओबी अब केवल एक पुल नहीं, एक प्रतीक बन चुका है — उस व्यवस्था का, जहां तकनीक से ज़्यादा होशियारी और जिम्मेदारी से ज़्यादा बचाव की संस्कृति फलती-फूलती है। 90 डिग्री का वह मोड़ केवल इंजीनियरिंग के फेल्योर का नमूना नहीं है, पूरे सिस्टम का साफ़ झूठा सर्टिफिकेट है और भ्रष्टाचार का जीता जागता सबूत भी — जिसमें अफसरों से लेकर नौकरशाहों ने आंखें मूंदी, नेताओं ने फोटो खिंचवाई और मंत्रियोंने बाकायदा बार-बार निरीक्षण करने का स्वांग रचा, और जब मामला मीडिया से लेकर सोशल मीडिया मेें राजधानी से लेकर पूरे देश में उछला और छीछालेदर हुई तो मंत्री जी ने जांच कराने की बात कर दी और एक ‘बलि का बकरा’ भी तलाश लिया गया और आनन-फानन जिसकी छुट्टी कर दी गई। क्या ये देश का पहला पुल था जिसका नक्शा, डिजाइन, ब्लू प्रिंट जांचे बिना अप्रूवल दिया गया या फिर 10 सालों में किसी भी आला

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अफ़सरान की इस ब्लंडर पर नक्शे से लेकर निर्माण तक दस साल में नजरे नहीं पड़ी ? लेकिन यह देश का पहला अजूबा पुल है जहां गलती पहले टेबल पर बनी फिर नक्शे में ,फिर ब्लू प्रिंट मेें, फिर फाइलों में और फिर जमीन पर पर मज़ाल किसी का ध्यान इस पर आकर्षित हुआ हो, या फिर…. जवाबदेही तो तब तय की गई जब यह ब्लंडर मीडिया की सुर्खिया बना, और वो भी सिर्फ एक पर जो शायद सबसे कम कसूर वार को। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब डिज़ाइन टेबल पर यह मोड़ साफ नजर आ रहा था, तब इसे स्वीकृति कैसे मिली? चीफ इंजीनियर से लेकर एसडीओ और निर्माण एजेंसी — क्या सभी की आंखों पर भ्रष्टाचार का पर्दा पड़ा था ? या वे इस मोड़ को ‘आर्किटेक्चरल इनोवेशन’ समझ बैठे थे? नहीं, असल में यह ‘सिस्टमेटिक इनैक्टिविटी’ थी — यानी मिली-जुली साजिश थी जानते सब थे, पर चुप थे। रेलवे ने भी गलती की जानकारी दी , लेकिन फिर भी सिस्टम की चुप्पी। निरीक्षण होते रहे, निरीक्षक आते-जाते रहे — लेकिन इस जानलेवा मोड़ को किसी ने मोडऩे की जहमत नहीं उठाई। क्यों? क्योंकि जवाबदेही की संस्कृति हमारी नौकरशाही और राजनीति से ग़ायब हो चुकी है। मीडिया ने जब तस्वीरें दिखाई, स्थानीय लोगों ने डर जताया, सोशल मीडिया पर हल्ला मचा — तब जाकर मंत्री जी जागे। और उस जागरण की परिणति क्या हुई, बस एक तबादला..। वाह री व्यवस्था! न सस्पेंशन, न तकनीकी समिति की जवाबदेही, न रिव्यू मीटिंग— बस एक इंजीनियर का ट्रांसफर और मीडिया को एक लाइन की कार्रवाई शुरू हो चुकी है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ जावेद शकील की गलती है नहीं, यह उस सोच की गलती है जिसमें ‘काम जल्दी करो’, ‘ऊपर से अप्रूवल ले लो’, ‘निरीक्षण को औपचारिकता बना दो’, और अगर कुछ गलत हो जाए तो किसी एक को पकड़ लो, बाकी को बचा लो। ऐसे में ये भी पूछा जाना चाहिए — क्या ये मोड़ वाकई जमीन की मजबूरी थी, या सिस्टम की मर्जी? क्या मेट्रो स्टेशन पास में होना वाकई कारण था, या सिर्फ बहाना। सबसे बड़ी बात जब इस प्रोजेक्ट की नींव रखी गई तब मेट्रो राजधानी में केवल अपना आस्तित्व ही तलाश पायी थी, फिर स्टेशन तो बहुत दूर की कौड़ी थी जिसकी दुहाई दी जा रही है? आज जब ये ब्रिज उद्घाटन से पहले ही मजाक और डर दोनों बन गया है, तो यह पूछना लाजिमी है — क्या हम सिर्फ कंक्रीट के ढांचे खड़े कर रहे हैं या अपने सिस्टम की कमजोर नींव भी उजागर कर रहे हैं? अब वक्त है कि जवाबदेही किसी एक की ‘सूली’ नहीं, पूरे सिस्टम की ‘सर्जरी’ से तय हो। वरना कल को कोई और मोड़, कोई और पुल — और किसी की जान — फिर सिस्टम की चुप्पी में गुम हो जाएगी।